साजिश या लापरवाही? उठते सवाल
इन घटनाओं के पीछे किसी बड़ी साजिश की आशंका जताई जा रही है। वन विभाग जंगलों में सुरक्षा और चौकसी के दावे तो कर रहा है, लेकिन आग की बढ़ती घटनाएं इन दावों की पोल खोल रही हैं। अधिकारियों ने वन उत्पादों की चोरी, लकड़ी कटाई और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कर्मचारियों को तैनात किया है, फिर भी जंगल धधक रहे हैं। यह भी पढ़े –
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मानपुर वन परिक्षेत्र में 15 फरवरी के बाद से 12,200 हेक्टेयर क्षेत्र में 25 बार आग लग चुकी है। नंदलाई घाटी और लग्नसा पहाड़ी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। महू वन परिक्षेत्र में 13,500 हेक्टेयर जंगल में 35 बार आग भड़क चुकी है। बड़ी जाम और पलासघाट क्षेत्र हाल ही में लपटों की चपेट में आए।
महुआ के लालच में जंगल जलाने की साजिश
गर्मियों में महुआ के फल जंगलों में गिरने लगते हैं, जिसे बीनने के लिए ग्रामीण बड़ी संख्या में जंगलों का रुख करते हैं। आशंका जताई जा रही है कि महुआ बीनने वालों द्वारा ही आग लगाई जा रही है, ताकि सूखी पत्तियां जलकर रास्ता साफ हो जाए और महुआ आसानी से इकट्ठा किया जा सके।
आग से निपटने की तैयारी
वन विभाग के पास मानपुर रेंज में 8 लीफ ब्लोअर और 7 ग्रास कटर, जबकि महू रेंज में 5 लीफ ब्लोअर मौजूद हैं। आग रोकने के लिए काउंटर फायर तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि अगर सुरक्षा के इंतजाम मजबूत होते, तो फिर जंगल इतने बड़े पैमाने पर क्यों जलते?अब देखना होगा कि वन विभाग इस विनाशकारी आग पर कब तक काबू पाता है। क्या जंगलों में सुरक्षा कड़ी होगी या फिर हरे-भरे जंगल इसी तरह स्वाहा होते रहेंगे?