मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया। CJI खन्ना ने कहा, “हमारी राय में, पूरी चयन प्रक्रिया धोखाधड़ी से दूषित है और इसे ठीक नहीं किया जा सकता। व्यापक हेरफेर और फर्जीवाड़े के कारण इस प्रक्रिया की वैधता खत्म हो चुकी है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन उम्मीदवारों की नियुक्ति हुई थी, उन्हें अब तक मिला वेतन वापस नहीं करना होगा, लेकिन इस फैसले के बाद उनकी सेवा समाप्त मानी जाएगी। साथ ही, नई भर्ती प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर शुरू करने और पूरा करने का आदेश दिया गया है, जिसमें बेदाग उम्मीदवारों के लिए कुछ छूट भी दी जा सकती है।
इस मामले में पांच मुख्य पक्षकारों की पहचान की गई: (1) पश्चिम बंगाल सरकार, (2) WBSSC, (3) मूल याचिकाकर्ता (जो चयनित नहीं हुए थे, कक्षा 9-10, 11-12, ग्रुप C और D के प्रतिनिधि), (4) जिनकी नियुक्ति रद्द की गई, और (5) केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI)। कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि OMR शीट्स के स्कैन किए गए डेटा की विश्वसनीयता कितनी है, क्योंकि मूल OMR शीट्स के साथ छेड़छाड़ की कोई ठोस जानकारी नहीं है। SSC ने स्वीकार किया कि परीक्षा नियमों के तहत मूल OMR शीट्स को परीक्षा के एक साल बाद नष्ट कर दिया गया था।
OMR शीट्स की स्कैनिंग और CBI की खोज
SSC ने OMR शीट्स की स्कैनिंग और मूल्यांकन का काम निजी कंपनी NYSA कम्युनिकेशंस को सौंपा था, जो SSC के दफ्तर में ही किया गया। लेकिन NYSA ने यह काम नोएडा की कंपनी DATA Scantech Solutions को आगे सौंप दिया था। CBI की रिपोर्ट के मुताबिक, DATA Scantech ने स्कैन की गई OMR शीट्स की डिजिटल कॉपी NYSA को दी, जबकि मूल हार्ड कॉपी SSC के पास छोड़ दी गई। SSC ने सभी विषयों की उत्तर कुंजी NYSA को सौंपी थी। जांच के दौरान CBI ने SSC के सर्वर डेटाबेस को जब्त किया और सितंबर 2022 में NYSA के पूर्व कर्मचारी पंकज बंसल से तीन हार्ड डिस्क बरामद कीं, जिनमें स्कैन की गई OMR शीट्स का डेटा था। बंसल ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत प्रमाण पत्र भी दिया।
CBI ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया कि SSC के सर्वर और बंसल के सर्वर के डेटा में कई असमानताएं थीं। रिपोर्ट में कहा गया, “कई उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा के अंकों में हेरफेर कर उन्हें क्वालिफाई कराया गया। यह असमानता साबित करती है कि अयोग्य उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाने के लिए अंकों में बदलाव किया गया।” इन खुलासों ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए।
कोर्ट में पक्षों के तर्क
गैर-चयनित उम्मीदवारों की ओर से वरिष्ठ वकील विभा मखीजा ने कहा कि पूरी प्रक्रिया रद्द करने के बजाय, गलत तरीके से चयनित लोगों को हटाकर मेरिट लिस्ट से नए लोगों को मौका देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि पूरी प्रक्रिया रद्द करने से उन बेदाग उम्मीदवारों को नुकसान होगा जो अब आयु सीमा पार कर चुके हैं। SSC की ओर से जयदीप गुप्ता ने दावा किया कि हाई कोर्ट का यह निष्कर्ष गलत है कि SSC ने सहयोग नहीं किया। उन्होंने कहा कि जब कोई उम्मीदवार नियुक्ति ठुकरा देता है, तो दूसरों को मौका दिया जाता है, जिससे संख्याओं में अंतर आया। रद्द की गई नियुक्तियों वाले उम्मीदवारों की ओर से वरिष्ठ वकील पीएस पटवालिया और करुणा नंदी ने कहा कि जब तक ट्रायल पूरा नहीं होता, यह तय करना मुश्किल है कि कौन सा डेटा मूल है। उन्होंने बंसल से मिले डेटा को “संदिग्ध” करार दिया। मीनाक्षी अरोड़ा ने सुझाव दिया कि बेदाग और दागी उम्मीदवारों को अलग करने के लिए व्यक्तिगत नोटिस जारी करना चाहिए, ताकि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो। दुष्यंत दवे ने CBI जांच पर सवाल उठाया, लेकिन CJI ने कहा कि मामला मेरिट पर सुना जा रहा है, न कि राजनीति पर।
अंतरिम राहत
22 अप्रैल 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने इन नियुक्तियों को “कैश-फॉर-जॉब्स” घोटाले के चलते रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2023 को अंतरिम राहत देते हुए कहा था कि अगर नियुक्तियां अवैध पाई गईं, तो वेतन वापस करना होगा। CBI को जांच जारी रखने की इजाजत दी गई, लेकिन कोई सख्त कदम उठाने से रोका गया। अब इस फैसले ने बंगाल की शिक्षा व्यवस्था और प्रभावित शिक्षकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। 4 अप्रैल को CBI जांच के खिलाफ राज्य की याचिका पर अलग से सुनवाई होगी।