पहला विकल्प-किसी भी राज्य में सीट कम न हो
लोकसभा में सीटों की संख्या 550 से अधिक हो, जिससे हर सीट की जनसंख्या पूरे देश में एक जैसी हो सके। अमेरिकी थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के फेलो मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन के अनुसार 2026 की अनुमानित जनसंख्या के आंकड़े बताते हैं कि लोकसभा को 848 निर्वाचन क्षेत्रों की जरूरत होगी, ताकि रिओपोरशन से किसी भी राज्य की मौजूदा सीटें कम नहीं हो।दूसरा विकल्प: लोकसभा की जगह विधानसभा सीटें बढ़ाई जाएं
रिटायर्ड आइएएस अधिकारी रंगराजन का तर्क है कि भारत की जनसंख्या चरम पर पहुंचने के बाद 2060 के दशक में घटने लगेगी। इसलिए लोकसभा की सीटों की बजाय राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के नजदीक रहकर काम करते हैं।तीसरा विकल्प : कनाडाई प्रणाली
कनाडा ने 2011 में संविधान में संशोधन कर बड़े, तेजी से बढ़ते प्रांतों और छोटे, धीमी गति से बढ़ते प्रांतों में संतुलन बनाने के लिए डिग्रेसिव प्रोपोर्शनल लागू किया। इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में छपे एक पेपर में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के प्रो. एस राजा सेतु दुरई और तमिलनाडु राज्य योजना आयोग के सदस्य आर श्रीनिवासन ने बताया कि कनाडाई प्रणाली को लोकसभा में लागू करने से कुल संख्या 552 हो जाएगी। उत्तर प्रदेश को नौ सीटे ज्यादा मिलेंगी, जिससे यह 89 हो जाएगी। वहीं तमिलनाडु की सीटें 39 ही रहेंगी।चौथा विकल्प: फर्टिलिटी रेट से फॉर्मूला
प्रो. एस. राजा सेथु दुरई और आर. श्रीनिवासन ने टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) को भी परिसीमन में शामिल करने का तर्क दिया। दुरई और श्रीनिवासन ने 2011 की जनगणना से टीएफआर-समायोजित आबादी को कैलकुलेट करने के लिए एक फॉर्मूला तैयार किया। इससे लोकसभा सीटों को 750 तक बढ़ाना होगा, लेकिन सीटों का इस तरह से रिओपोरशन किया जा सकता है कि कम स्पीड से बढ़ती आबादी वाले राज्यों को नुकसान नहीं हो। इस फॉर्मूले से उत्तर प्रदेश को 106 और बिहार को 50 सीटें मिलेंगी। तमिलनाडु जैसे कम आबादी वाले राज्य को 55 सीटें मिल सकती है।आखिरी बार 2002-08 के बीच हुआ परिसीमन
जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से नुकसान की आशंका पर दक्षिण के राजनीतिक दल पहले से विरोध करते रहे हैं। यही वजह है कि 1981 और 1991 की जनगणना के बाद जनसंख्या के आधार पर परिसीमन टाल दिया गया था। ताकि जनसंख्या नियंत्रण का दक्षिण के राज्यों के हितों पर फर्क न पड़े। आखिरी बार वर्ष 2002-08 तक परिसीमन हुआ, तब 2001 की जनगणना को आधार बनाया गया। लेकिन वर्ष 1971 की जनगणना के अनुसार, विधानसभाओं और संसद में तय की गई सीटों की कुल संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया था।परिसीमन से कैसे बदले लोकसभा सीटों के आंकड़े
वर्ष | लोकसभा सीटों की संख्या | जनसंख्या (करोड़ में) | प्रति सीट औसत जनसंख्या (लाख में) |
1951 | 494 | 36.1 करोड़ | 7.30 |
1961 | 522 | 43.9 करोड़ | 8.4 |
1971 | 543 | 54.8 करोड़ | 10.1 |
जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित नहीं करेंगे-केंद्र
केंद्र का कहना है कि दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित नहीं किया जाएगा और उनकी लोकसभा सीटों की संख्या में कमी नहीं होगी। गृहमंत्री अमित शाह आश्वस्त कर चुके हैं कि परिसीमन के बाद प्रोरेटा के हिसाब से दक्षिण के एक भी राज्य की एक भी सीट कम नहीं होगी। यह भी पढ़ें