इन चीजों पर अब अधिक कीमतों का सामना करना पड़ सकता है
ये बदलाव भारतीय व्यापारियों और कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें अब अधिक कीमतों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है। वहीं, कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे भारतीय कंपनियों को अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को पुनर्गठित करने और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने का अवसर मिल सकता है। अमेरिका भारत से कई तरह के उत्पाद आयात करता है, जिनमें मुख्य रूप से ये चीजें शामिल हैं: - कीमती पत्थर और आभूषण (Gems & Jewelry)
- हीरा (कट और अनकट)।
- सोने-चाँदी के आभूषण।
2 .दवाइयाँ और जैविक रसायन (Pharmaceuticals & Chemicals)
- जेनेरिक दवाएँ।
- सक्रिय फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API)।
- कार्बनिक रसायन।
3. कपड़ा और परिधान (Textiles & Apparel)
- सूती वस्त्र।
- रेडिमेड गारमेंट्स।
- हाथ से बुने और मशीन से बने कालीन।
4. सूचना प्रौद्योगिकी और सेवाएँ (IT & Services)
- सॉफ़्टवेयर सेवाएँ।
- BPO और IT सपोर्ट।
5. मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स (Machinery & Electronics)
- इलेक्ट्रॉनिक सामान और कंप्यूटर पार्ट्स।
- औद्योगिक मशीनरी।
6. ऑटोमोबाइल और वाहन पार्ट्स (Automobiles & Auto Parts)
- कारों और दोपहिया वाहनों के पार्ट्स।
- टायर।
7. कृषि उत्पाद (Agricultural Products)
- मसाले (मिर्च, हल्दी, धनिया)।
- चाय और कॉफ़ी।
- बासमती चावल।
- समुद्री खाद्य पदार्थ (झींगा आदि)।
8.स्टील और मेटल्स (Steel & Metals)
- स्टील उत्पाद।
- एल्युमिनियम और तांबे के उत्पाद।
9.पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल्स (Petroleum & Petrochemicals)
- परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद।
- प्लास्टिक और पॉलीमर।
10.विमान और हवाई परिवहन सामग्री (Aircraft & Aerospace Products):
विमानों के पुर्जे। विमानन उपकरण और पार्ट्स।
भारतीय उद्योगों को अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ेगा
अमेरिका की ओर से भारत पर नया टैरिफ लागू होने से भारतीय उद्योगों को अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ेगा, जिससे उत्पादन लागत बढ़ सकती है। अमेरिका के प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप की ओर से कम प्रति व्यक्ति आय वाले कई देशों पर सबसे ज़्यादा टैरिफ लगाए गए हैं। टैरिफ का निश्चित रूप से अमेरिका और बाकी दुनिया पर बहुत ज़्यादा आर्थिक असर होगा। इससे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, विकास धीमा हो सकता है और इससे भी बुरा हो सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप ने सभी देशों पर 10% शुल्क लागू किया
अमेरिका के प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल, 2025 को सभी देशों पर 10% शुल्क लागू किया है, इसके बाद प्रत्येक देश के लिए विशेष शुल्क निर्धारित किया गया। भारत पर 26% शुल्क लगाया गया है, जो व्यापार घाटा कम करने और ट्रंप की ओर से कुछ देशों की व्यापारिक परंपरा को अनुचित मानने के तहत लागू की गई एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
ये कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार मानकों के अनुरूप नहीं
भारत की व्यापारिक परिपाटी को यू.एस. सरकार की आलोचना का सामना करना पड़ा है। ध्यान रहे कि सन 2014 से भारत ने विभिन्न आयातों पर शुल्क बढ़ाए हैं, खासकर कृषि उत्पादों में, जिसके कारण उसे संरक्षणवादी (protectionist) माना जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि भारत कृषि उत्पादों जैसे डेयरी, मेवा, और फल, साथ ही औद्योगिक वस्तुओं पर उच्च शुल्क लगाता है, जिससे अमेरिकी उत्पादों के भारतीय बाजार में प्रवेश पर प्रतिबंध लगता है। ये कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार मानकों के अनुरूप नहीं माने गए हैं।
ट्रंप की नजर में यह निर्णय अमेरिका के उत्पादकों के लिए अधिक लाभकारी
ट्रंप की नजर में यह निर्णय अमेरिका के उत्पादकों के लिए अधिक लाभकारी व्यापारिक शर्तों को सुनिश्चित करने और वैश्विक व्यापारिक संबंधों में संतुलन लाने की कोशिश का हिस्सा है। यह कदम विभिन्न देशों की व्यापार प्रथाओं की समीक्षा के बाद उठाया गया है, जिसमें भारत प्रमुख रूप से उस व्यापारिक अधिशेष के कारण ध्यान में आया है, जो उसे अमेरिका से प्राप्त होता है और साथ ही वह उच्च शुल्क लागू करता है।
नई शुल्क संरचना का भारत और यू.एस. दोनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव
अंतरराष्ट्रीय बाजार के पंडितों की मानें तो नई शुल्क संरचना का भारत और यू.एस. दोनों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की संभावना है। भारत के लिए इसका मतलब हो सकता है कि अमेरिकी बाजार में निर्यातित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो, जिससे व्यापार में मंदी आ सकती है। वहीं, अमेरिका में यह शुल्क मुद्रास्फीति (inflation) को बढ़ा सकता है और सस्ते सामानों की पहुंच को प्रभावित कर सकता है, जिससे उपभोक्ताओं और व्यापारों दोनों पर असर पड़ेगा। इस व्यापारिक तनाव का वैश्विक व्यापार पर भी असर पड़ सकता है। जो देश भारत और यू.एस. के साथ मजबूत व्यापारिक संबंधों पर निर्भर हैं, वे भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। बहरहाल यह प्रत्याशित शुल्क भारत और यू.एस. के बीच व्यापारिक संबंधों के लिए दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकते हैं, क्योंकि दोनों देश अपनी आर्थिक रणनीतियों का पुनः मूल्यांकन करेंगे।