तामिया, जुन्नारदेव में तालाब ज्यादा, अमरवाड़ा-हर्रई में कम…ये हैं वजह
राजनीतिक दबाव नहीं बना तो तैयार नहीं हुए प्रोजेक्ट, ज्यादातर गांव में पेयजल समस्या अलग
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छिंदवाड़ा.छिंदवाड़ा जिले का अमरवाड़ा और हर्रई तहसील से लगे ज्यादातर गांव पेयजल समस्या से ग्रस्त है तो फसल भी औसत उत्पादन में कम हो रही है। इसका मुख्य कारण तामिया, जुन्नारदेव की तुलना में इस इलाके में तालाब की निर्माण कम किया गया है। इसके अलावा क्षेत्रीय जनता भी जागरूक नहीं होने से इस समस्या को प्रशासन के ध्यान में भी नहीं लाया गया है।
पिछले पांच साल का रिकार्ड देखा जाए तो कोरोना संक्रमणकाल से वर्ष 2025 तक छिंदवाड़ा जिले में करीब 150 तालाब से ज्यादा बनाए गए हैं। इन तालाबों का औसत सबसे ज्यादा तामिया और जुन्नारदेव में मिलेगा। जबकि यहीं तालाब अमरवाड़ा-हर्रई ब्लॉक में ढूंढने पर ही मिलेंगे। इस असमानता का एक कारण राजनीतिक दबाव है, जिसे इस जुन्नारदेव क्षेत्र के जनप्रतिनिधि अपनी पंचायतों के लिए बना पाए हैं। दूसरा कारण भौगोलिक स्थिति है। अमरवाड़ा-हर्रई के इलाके सघन आदिवासी होने के साथ पथरीली चट्टान वाले हैं। इस क्षेत्र में मौजूदा जनप्रतिनिधियों ने तालाब निर्माण पर कभी ध्यान नहीं दिया है। इसके साथ ही यहां की राजनीतिक शक्तियों ने कभी पानी संकट से जूझते इलाकों को पेयजल देने के प्रयास भी नहीं किए। इसके चलते प्रशासन पर कभी तालाब निर्माण का दबाव नहीं बना। क्षेत्र के विधायक, जिला पंचायत सदस्य, जनपद सदस्य और पंच-सरपंच भी कभी तालाब के लिए सक्रिय नहीं दिखे। इसी वजह से ये क्षेत्र आज भी सूखा है, जहां गर्मी आते ही पानी का विकराल संकट बन जाता है।
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तामिया-जुन्नारदेव में तालाब सर्वाधिक बने
ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के कर्मचारी भी स्वीकारते हैं कि पिछले पांच साल के दौरान तामिया-जुन्नारदेव में तालाब सर्वाधिक बनाए गए। यदि छिंदवाड़ा जिले में 150 तालाब बने तो इन इलाकों में करीब 70 तालाब का निर्माण कराया गया है। इसका कारण राजनीतिक दबाव, स्थान का चयन हो या फिर दूसरे कारण, कहीं न कहीं इन तालाबों से यहां की जमीन का फायदा मिला है। इससे किसान खेती कर रहे हैं या फिर यहां चावल, मक्का समेत अन्य फसलों की खेती भी होने लगी है।
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अमरवाड़ा के 150 से ज्यादा गांवों में पेयजल संकट
अमरवाड़ा विधानसभा के तीन प्रमुख नगर अमरवाड़ा, हर्रई और सिंगोड़ी से जुड़े करीब 150 गांवों में पेयजल संकट जरूर मिलेगा। यहां के लोग समय-समय पर कलेक्ट्रेट जनसुनवाई में आते रहे हैं। इन गांवों को संकट का समाधान प्रशासन दे नहीं पाया है। जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से भी ये क्षेत्र दूसरे आदिवासी इलाकों से अलग नहीं हो पाया है।
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पेंच-शक्कर लिंक परियोजना के डैम से आस
इस समय पेंच-शक्कर लिंक परियोजना के हर्रई डैम के निर्माण में भू-अर्जन का सर्वेक्षण चल रहा है। इस डैम से हजारों हैक्टेयर जमीन सिंचिंत होगी और पेयजल के लिए भी पानी मिलेगा। इस दौरान कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं। जैसा माचागोरा डैम निर्माण के समय किया गया था। इस पर कलेक्टर की ओर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए गए हैं। फिलहाल इस परियोजना के पूरी होने पर ये क्षेत्र जरूर पानी से भरपूर होगा।
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इनका कहना है…..
अमरवाड़ा-हर्रई का भूगोल अलग है,जहां पथरीली चट्टानें अधिक होने से तालाब कम बनाए गए हैं। फिर भी जिन पंचायतों से मांग आ रही है,वहां तालाबों का निर्माण हो रहा है।
-आरएल ढाकरे, कार्यपालन यंत्री, ग्रामीण यांत्रिकी सेवाएं।
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