राजस्थान की आन का प्रतीक रहे माटी में रचे बसे लोकगीत कहीं आज की महिलाएं भूल ना जाए, इसी को लेकर मौखिक साहित्य कहे जाने वाले लोकगीतों को झालावाड़ जिले के अकलेरा तहसील क्षेत्र के सरड़ा गांव निवासी 92 वर्षीय धापू बाई सेन झालावाड़ की आम बोली में लिखित रूप में संजोकर चली गई। धापू बाई का हृदय गति रुकने से निधन हो गया।
लोक गीत गायिका धापू बाई के पौत्र बालकवि मनीष कुमार सेन ने बताया कि दादी अक्सर बताया करती थी कि लोकगीत पर्यावरण और समय अनुकूल रचे जाते हैं। इनका माटी और हमारी लोक-संस्कृति से जुड़ाव होता है। लोकगीत हमारी लोक संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं। पहले औरतें चक्की चलाते समय, पानी लेने जाते समय, मांडने बनाते समय या अधिकांश अपने कामकाज के दौरान लोक गीत गाया करती थी। लेकिन अब पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित महिलाएं लोक गीतों को भूलती चली जा रही हैं। इसी पीड़ा को मन में लिए 92 वर्षीय लोक गीतकारिकाधापू बाई सेन लोक गीतों को भावी पीढ़ी के लिए संजोने का सराहनीय प्रयास कर गई।
मनीष ने बताया कि दादी अक्सर लोकगीत गाने के दौरान या गाने के बाद अपनी डायरी में लिखती थी। पिछले दो से तीन साल में उनके हाथ कांपने लगे थे। ऐसे में वह मुझे अपने पास बिठाकर लोग गीतों को डायरी में लिखाने लगी। डायरी में लगभग 118 लोकगीत का संकलन है। जिन्हें जल्द ही एक किताब में पिरोया जाएगा। किताब के प्रकाशन के लिए जिले के वरिष्ठ साहित्यकारों का मार्गदर्शन लिया जा रहा है।
हर मांगलिक कार्यक्रम के गीत हैं डायरी में
बालकवि ने बताया कि दादी को लोकगीतों से अत्यधिक लगाव रहा है। दादी अपने दैनिक दिनचर्या के अधिकांश कार्य करते समय या खाली बैठे रहते समय गीतों को लगातार गाया करती थी। सगाई, बधावा, चाकभात, राती जगा, मायरा, घोड़ी गीत, तोरण गीत, बन्ना-बन्नी, हथलेवा, कंवर कलेवा, जुआ-जुई, जमाई, कामण, पावणा, बिन्दौरी, जच्चा-बच्चा, सहित देवी देवताओं आदि के गीत दादी गाकर लिखवाती थी। साथ ही दादी धापूबाई सेन गीतों को गाने का विशेष प्रयोजन भी बताया करती थी।
प्रमुख लोक गीतों की बानगी
धापू बाई के लोक गीता में गणेश वंदना “पार्वती ने गजानंद जाया, जाय आंगणिये गुड़काया…. खेलतखेलत गणपत मात गोणे आया, सुहाग कामण गीत दाऊजी की अली गली में मालण हेलो देवे जी, काका जी की अली गली में मालण हेलो देवे जी, छाबड़िया में कामणियासवाग बिड़ला लाई जी, असा सवागम्हारि नवल बनी नै सौवे जी, लड़वण चाली आपणी काक्या के पास, लाओ म्हारिकाक्या अमर सवाग, लाड़ी की माता दाल दलो नी उड़दा की, थे उड़द मूंग-सा दल-लो, सुहाग कामण कर लो, बासण लोक गीत खुमार का रे बासणघड़बो छोड़ दे, मायरा लोकगीत गाड़ी जो रड़की रेत मे रे बीरा उड़रिगगना गाट, चालो म्हारा दोरी उतावला आपणी बैण्यां बाई जौवे बाट, घोड़ी लोकगीत श्याम सलोणी सुंदर घोड़ी आ खडी दरवाजे पे, किने बुलाई किने सजाई काई के कारण आई है, तोरण लोकगीत कोरी कोरी खुलडी में दहीडों जमायो राज, आज रे नाचण को रायबरनौतजिमायो राज, जमाई लोकगीत फागा तो बांधो जमाई सा लाखों रुपया की, मुरक्यां तो था फेणों जमाई-सा लाखों रुपया की, रातिजगा लोकगीत पूर्वज आया जी म्हारा पूर्वज आया आदि लोकगीत डायरी में संकलित है।