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आर्ट एंड कल्चर: लोक संस्कृति देती है परम्पराओं का उजास

—डॉ. राजेश कुमार व्यास (संस्कृतिकर्मी, कवि और कला समीक्षक )

Apr 05, 2025 / 01:27 pm

विकास माथुर

लोक का एक अर्थ है, देखना। जो कुछ प्रत्यक्ष दिखता है, वही नहीं जो अंत: चक्षु से भी हम देख लें-वही देखना है। लोक की इस दृष्टि ने कलाओं को सदा ही समृद्ध किया है। लोक-संस्कृति युगीन संदर्भों में हमें नई परम्पराएं सौंपती है। मकर संक्रांति पर कई जगहों पर पतंगे उड़ती हैं। पर बीकानेर में अक्षय तृतीया पर पतंगें उड़ाते हैं। लोक ने यह संस्कार डाला।
राव बीका ने पन्द्रह सौ पैंतालीस में वैशाख माह की द्वितीया-तृतीया को जब बीकानेर नगर की स्थापना की तो उमंग में एक बड़ा चिन्दा यानी पतंग उड़ाई। बस तब से ही वहां छतों पर पहुंचकर भयंकर गर्मी में पतंगें उड़ाने की परम्परा हो गई। राजस्थान में कभी दूर तक पसरे रेगिस्तान पर हवाएं चलती तो आंधियों से सब-कुछ धुंधला हो जाता। गर्मी में भीषण लू चलती। पानी की एक-एक बूंद के लिए आदमी तरसता। अभाव ही अभाव थे, परन्तु उन अभावों में जीवन से जुड़े संस्कारों ने चटख रंगों की चूंदड़ी में, रंग-बिरंगी पाग ने भाव भरे। अभावों का हमारे यहां रोना नहीं है, उससे जूझते जीवन को उल्लसित भावों से जीने की सीख घुली है। लोक विश्वास, मिथक, कथा-कहानियां लोक संस्कृति का सधे ढंग से निर्माण करती है।
धरती पर वनस्पति के उद्गम को भीलों के गायन- ‘बड़लिया हिंदवा’ में संजोया गया है। नवरात्रि में यह लोक-गायन ढाक और थाली नामक लोकवाद्यों के साथ लयबद्ध रूप में होता है। गायन कथा है-प्रारम्भ में पृथ्वी पर कोई पेड़-पौधा नहीं था। वनस्पति नहीं होने की व्यथा लेकर देवता मां अंबाव के पास पहुंचे। अंबाव ने कहा, मैंने सपने में बरगद देखा है। सबने ढूंढा पर वह नहीं मिला। एक रोज भौंरा उड़ता दिखा। उससे पूछा गया पर उसने नहीं बताया। उसे खौलते तेल की कढ़ाही में डाला गया। उसने कहा, मुझे छोड़ो वह पाताल लोक में है। सभी देवता पाताल राजा वासुकि की वाटिका पहुंचे। वृक्ष-वनस्पतियां देख देवता नाचने लगे। वासुकि की पत्नी नागिन ने कहा, शांति से विहार करें अन्यथा नागराज जाग जाएंगे। देवता कहां माने! वासुकि की नींद खुली तो उसने फूंकार मार सभी को पाषाण-सा कर दिया। भैरव बच गए , मां के पास पहुंच सारी बात बताई। नाराज देवी ने वासुकि का फन नेवले से कुचलवा दिया। वासुकि ने बरगद के बारे में बताया। देवी ने सभी देवताओं को भी पुनर्जीवित कर दिया। बरगद ने मां से कहा, मानव मुझ पर कुल्हाड़े चलाएंगे। देवी ने वचन दिया कि ‘सवा लाख मानव मरेंगे तो तुम पर कुल्हाड़ा चलेगा, अन्यथा तुम पर कोई आंच नहीं आएगी।’ बड़लिया पृथ्वी पर चलने के लिए तैयार हो गया। इस तरह पृथ्वी पर पेड़ आया। लोक में रची यह भारत-गाथा आज भी भील बांचते हैं। ‘बड़लिया हिंदवा’ से आगे की लोक संस्कृति खेजड़ली का बलिदान है। लोक संस्कृति आधुनिक जीवन का उजास बनती है। नैरंतर्य में पल्लवित होती मानव जीवन की आस बनती है।

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