अब तक, भारत में एनिमेशन का मतलब था बच्चों के कार्टून या फिर पौराणिक कथाओं पर आधारित शो। बड़े पर्दे पर हमारा मनोरंजन चमक-दमक से भरी बॉलीवुड फिल्मों या हॉलीवुड की तेज-तर्रार एक्शन फिल्मों तक सीमित था, लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। इंटरनेट के सर्वव्यापी होने, नेटफ्लिक्स जैसे स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर घिबली फिल्मों की उपलब्धता और लोगों के बीच ऑनलाइन चर्चाओं के कारण माय नेबर टोटोरो, स्पिरिटेड अवे और हाउल्स मूविंग कैसल जैसी फिल्में अब सिर्फ एनिमे फैन तक सीमित नहीं रहीं। खासकर युवाओं में इनकी चर्चा शुरू हो गई है।
सवाल यह है कि घिबली का असली आकर्षण क्या है? क्यों ये गहरी, शांत और चिंतनशील जापानी फिल्में हमें लुभा रही हैं? पहला कारण है उनकी दृश्यात्मक सुंदरता। कंप्यूटर-जनित ग्राफिक्स के इस युग में घिबली की एनीमेशन शैली अद्वितीय और ताजगीभरी लगती है। आप महसूस कर सकते हैं कि हर एक फ्रेम को असली इंसानों ने बनाया है। यह खालिस जादू की तरह है। यह एनिमेशन या आंखों को सुकून देने वाली चीज से बढ़कर है। घिबली की फिल्मों की कहानियां भारत जैसे समाज में भी प्रासंगिक हैं। बचपन का जीवन बदल देने वाला जादू, बड़े होने का बोझ, जीवन के प्रति श्रद्धा, साहस जुटाने की प्रेरणा, युद्ध की अनकही उदासी और सादगी में छिपी खुशी।
घिबली की कहानियों में ये सारी बातें हमेशा भावनात्मक रूप से सच्ची लगती हैं। स्पिरिटेड अवे हमें खो जाने और फिर अपनी राह खोजने का अनुभव कराती है, जबकि टोटोरो हमें बचपन की याद दिलाती है। घिबली लहर कई मायनों में बहुत सकारात्मक है। यह हमें एनिमेशन को सिर्फ बच्चों के मनोरंजन से आगे जाकर गंभीर कहानी कहने के तरीके के रूप में देखने के लिए प्रेरित कर रही है। यह दिखाती हैं कि कार्टून आपको चिंतनशील और संवेदनशील बना सकते हैं। घिबली फिल्मों में शांत बहती नदियों, सुकून देने वाले जंगलों और पहाडिय़ों के रूप में प्रकृति के प्रति समर्पण काबिले-तारीफ है। मेरे जैसे शहरी जीवन जी रहे भारतीय के लिए यह रोजमर्रा की जिंदगी में शांति का एक टुकड़ा है।
ये फिल्में गहरी चिंता और आघात जैसे भावनात्मक विषयों को भी बेहिचक संवेदनशीलता से छूती हैं। इनके किरदारों की खामियों और संघर्ष को देखकर हमें लगता है कि हम अकेले नहीं हैं और भावनाओं पर खुलकर बात करना स्वाभाविक है। और हां, इनमें शानदार कहानियों के साथ जापानी संस्कृति की झलक देखने का अनोखा सौंदर्य भी है। अब घिबली के दूसरे पहलू पर भी सोचना जरूरी है। क्या यह वास्तविकता से भागने का एक जरिया भी बन सकती है? इनकी खूबसूरत, दयालु दुनिया में खो जाने से कहीं असल जिंदगी और अधिक निराशाजनक तो नहीं लगने लगेगी? जिंदगी हमेशा घिबली फिल्मों जितनी कोमल या जादुई नहीं होती। अगर हम अपनी समस्याओं को हल करने की राह फिल्मों की तरह सुंदर और सहज होने की उम्मीद करने लगें तो क्या हम खुद को निराशा के लिए तैयार कर रहे हैं? एक और पहलू यह भी है कि कहीं हम घिबली की सिर्फ सतही सुंदरता को पसंद करने तक ही तो सीमित नहीं हो रहे? एक सुंदर स्क्रीनशॉट शेयर करना आसान है, लेकिन असली जादू तो कहानियों में है।
इन फिल्मों की गहराई और गंभीर संदेश को समझने के बजाय, अगर यह सिर्फ एक फैशन ट्रेंड बनकर रह जाए तो इसका असली जादू खो सकता है। भले ही दूसरी संस्कृतियों के बारे में जानना शानदार है, पर हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि घिबली के प्रति हमारा प्यार भारत की अपनी अद्भुत कहानियों और कला को उपेक्षित न कर दे। भारत में घिबली के लिए बढ़ती दीवानगी इस बात का संकेत है कि हम गहरी, कलात्मक और भावनाओं से भरी कहानियों की तलाश में हैं। ये फिल्में अपार खुशी दे रही हैं, आत्म-चिंतन को प्रेरित कर रही हैं और कला की कद्रदानी सिखा रही हैं, जो वाकई में सकारात्मक संकेत है। सबसे महत्त्वपूर्ण संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
हम इन फिल्मों से प्रेरणा लें, उनके सौंदर्य और भावनात्मक गहराई को अपनाएं, लेकिन जमीन से जुड़े रहें। घिबली हमें अपने आसपास की दुनिया को थोड़ा अधिक दयालु नजरों से देखने के लिए प्रेरित करे, न कि हमें पूरी तरह किसी और दुनिया में खो जाने पर मजबूर कर दे। हम यथार्थ से न कटें और वास्तविकता का सामना करें। घिबली की हवा भारत में पूरे वेग से बह रही है और यह अपने साथ कुछ अनमोल सीख लेकर आई है। इस यात्रा का आनंद लें, इस कला की सराहना करें और इन शानदार फिल्मों के हमारे लिए मौजूदा मायने पर बातचीत जारी रखें।