कपड़ों से भाषा तक अपनाई संस्कृति
राजस्थानी साफा और ओढऩी में सजे कुछ पर्यटक मंदिर प्रांगण में बैठे मिले। स्थानीय पुजारियों से वे पूजा की विधि, देवी-देवताओं के अर्थ और पर्वों की कहानी सुन रहे थे। कुछ ने ‘प्रणाम’, ‘धन्यवाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर भाषा के माध्यम से भी आत्मीयता जताई।
आस्था और जिज्ञासा का अनोखा संगम
ये पर्यटक केवल देखने नहीं आए, वे जानना चाहते हैं — यह संस्कृति कैसे जीती है? इन देवस्थलों में वह कौन सी शक्ति है जो इतनी दूर से उन्हें खींच लाई? वे कहते हैं, यह केवल यात्रा नहीं, एक आत्मिक अनुभव है।विदेशी सैलानियों की जुबानी:
जर्मनी से आई सोफिया बताती है कि आरती के समय मैंने आंखें मूंद लीं… जैसे किसी ऊर्जा से जुड़ गई हूं। इटली निवासी लुका का कहना है कि मंदिरों में सिर्फ मूर्तियां नहीं, जीवन है, भावनाएं हैं। ऑस्ट्रेलिया से आई एमिली का कहना है कि ध्यान करते समय एक गहराई का अनुभव हुआ, जो मेरे देश में मुश्किल है।
विदेशियों का जैसलमेर प्रेम
-हर साल जैसलमेर में 60 हजार से अधिक विदेशी पर्यटक आते हैं। -जैन मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, स्वांगिया माता मंदिर, रामदेवरा जैसे स्थल अब धार्मिक पर्यटन स्थल- विदेशी सैलानियों में योग, संस्कृत, ध्यान और भक्ति संगीत में गहरी रुचि