अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए नहीं किया जा सकता बाध्य
इस मामले की जड़ में एक आम समस्या थी, जो देश भर में कई घर खरीददारों को परेशान करती है—बिल्डरों द्वारा वादे के मुताबिक समय पर मकान न देना। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि खरीददारों को अपने सपनों का घर पाने के लिए अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर बिल्डर ने खरीद समझौते में तय की गई समय सीमा का पालन नहीं किया, तो खरीददार के पास यह विकल्प है कि वह मकान लेने से इनकार कर दे और अपनी जमा राशि के साथ-साथ ब्याज सहित पूरा रिफंड मांग सके। फैसले के दौरान जस्टिस महेश्वरी और जस्टिस कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है। कोर्ट ने देखा कि अक्सर बिल्डर खरीददारों को लंबे समय तक झूठे आश्वासनों के सहारे इंतजार करने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे उनकी वित्तीय और भावनात्मक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने खरीददारों को एक मजबूत कानूनी हथियार दिया है, जिससे वे बिल्डरों की मनमानी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर सकें।
जमा राशि पर मिलना चाहिए उचित ब्याज
यह फैसला उन लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बड़ी राहत की खबर है, जो अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर घर खरीदते हैं, लेकिन बिल्डरों की लापरवाही के चलते सालों तक इंतजार करने को मजबूर होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि देरी की स्थिति में खरीददार को सिर्फ रिफंड ही नहीं, बल्कि उसकी जमा राशि पर उचित ब्याज भी मिलना चाहिए, ताकि उसे हुए नुकसान की भरपाई हो सके। इस फैसले से रियल एस्टेट डेवलपर्स पर समय पर प्रोजेक्ट पूरा करने का दबाव बढ़ेगा और यह खरीददारों के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उन लोगों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जो अपने घर के सपने को हकीकत में बदलने के लिए बिल्डरों की दया पर निर्भर रहते हैं। अब खरीददारों को यह भरोसा मिला है कि अगर बिल्डर अपने वादे से मुकरता है, तो कानून उनका साथ देगा।