ऋक्-साम रूप पुर के केन्द्र में प्राणाग्नि ही पुरुष है, यजु: है। यही हृदय आत्मपुरुष है। इसी को अहम् कहते हैं। अर्थात् महद् प्रकृति के सत्वरूप अहंकृति, रजरूप प्रकृति, तमरूप आकृति की समष्टि को ही अहंभाव कहा जाता है। सूर्य-चन्द्रमा-पृथ्वी के परिभ्रमण से पारमेष्ठ्य महान में यह अहंभाव पैदा होता है। महन्मूलक-सौर अहंकृति रूप अहं ही यहां अहम् भाव कहलाता है। अहंकृति रूप, यजुराग्नि रूप, ही पुरुष है। असंगो ह्ययं पुरुष:-न सज्जते, न व्यथते, न रिष्यति। ऋक्-साम रूप छन्द: पुर के कारण ही पुरुष है जो स्वस्वरूप से असंस्पृष्ट* ही रहता है। सौर पुरुष रूप विज्ञानात्मा तो पाप्माओं* से असंस्पृष्ट ही रहता है। इनका सबन्ध चान्द्र-प्रकृति एवं पार्थिव-आकृति से रहता है।
सूर्य के केन्द्र यानी स्थिति और परिधि यानी गति रूप दो विवर्त* होते हैं। स्थिति ब्रह्मोदन है, गति प्रवर्ग्य रूप है। प्रवर्ग्य का अलग होना ही ‘किंचिच्चलन’ (किंचित चलन) कहलाता है- जो कि स्थिति का आंशिक विकपन* ही है। लोकभाषा में यही ‘भय’ कहलाता है। ब्रह्मा के कालचक्र का सहज नियम ही भयदण्ड है। इसी से सूर्य गतिशील रहता है। स्वाक्ष* से अपने स्थल पर तथा अयन* रूप से परमेष्ठी के चारों ओर यह गतिशीलता रहती है। भय के कारण ही केन्द्र रूप स्थिति भाव को प्रवर्ग्य के पृथक् होते समय क्षणमात्र के लिए विकपित कर देता है। जैसे ही प्रवर्ग्य अलग हुआ, भय शान्त हुआ और सूर्य पुरुष का भी भय रूप विकपन शान्त हो जाता है। प्रवर्ग्य रूप भूपिण्ड पैदा हो गया। भूपिण्ड से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। दोनों सूर्य से अलग हो गए।
सूर्य एकाकी हो गए। इस सौर पुरुष के केन्द्र में सृष्टि बीज रूप वह महान् अनुबन्ध व्यक्त हुआ, जिस कामबीज को मन का रेत कहा गया है। यत् रूप प्राण, जू रूप वाक् के आधार पर हृदय में काममय मन भी तो था। मन-प्राण-वाक् रूप सौर पुरुष ही हिरण्यगर्भ मनु है। उनकी पत्नी श्रद्धासोममयी ‘मानवी’ हुई (शतरूपा)। इसी मनु के मन से कामना, प्राण से तप, वाक् से श्रम पैदा हुआ। इनकी समष्टि से प्रथम मनोमय काम ही हुआ। अत: सृष्टि के मूलबीज को मनोज कहते हैं। मनोज रस का बलों से समन्वय करता है। सद् रस को असद् बलों से समन्वित करना ही काम का प्रधान पौरुष है। सत्ता को भाति में समन्वित करना काम का पौरुष है। सद् रूप अहं का असद् रूप आकृति-प्रकृति रूप कलात्मक नाम-रूपों से सबद्ध करते जाना।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेत: प्रथमं यदासीत्। सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा। (ऋ. 10.129.4)
चन्द्रमा के योग से भूपिण्ड सौय बन जाता है। सौर पुरुष आग्नेय ही रहता है। स्वयंभू (ब्रह्माग्नि) सुब्रह्म (परमेष्ठी) से सूर्य व्यक्त हुए थे, वह भी अपने अर्द्धस्वरूप से अग्नि-सोम प्रधान बन गए। प्रथम दापत्य में (भावरूप) ब्रह्माग्नि ही द्रुत होकर सुब्रह्मात्मक अथर्व में परिणत हुआ था। द्वितीय दापत्य में भी (जो कि गुणानुगत विकार सर्ग—मैथुनी सृष्टि का प्रवर्तक है) सौराग्नि ही द्रुत प्रवर्ग्य रूप भूपिण्ड बना। इसी का भृगु-अंगिरा अनुगत (साथ रहने वाला) अत्रिप्राण ही चान्द्रसोम बना। द्यावा पृथ्वी रूप सांव+त्सरिक- दापत्य भाव सपादक-ऋताग्नि रूप वृषा, ऋत् सोम योषा (पुंभाव और स्त्री भाव) एक ही सौर पुरुष के व्याकृत रूप बने। यही सौर पुरुष ‘काम’ का पहला पौरुष कहलाया।
अर्द्ध सौर आकाश अग्नि प्रधान पुरुष है, शेष अर्द्ध आकाश सोम प्रधान स्त्री है। दोनों मिलकर एक दपती है—संवत्सर प्रजापति है। यज्ञात्मक प्रमाणित हो रहे हैं। इसी प्रजापति से मानव सर्ग उत्पन्न होता है। इस उत्पन्न की तिथि वसन्त आरंभ काल-फाल्गुनी पूर्णिमा को ही माना। यही सौर मध्वाग्नि (मधु) का उपक्रम (आरभ) काल है जो प्रजनन कर्म की मूल प्रतिष्ठा रूप शुक्रस्थ काम का उद्दीपक* माना गया है।
स हैतवानास-यथा स्त्री पुमां सौ सपरिष्वक्तौ-प्रजापति इन स्त्री-पुरुष रूप वृगल* रूप दो रूपों से असमन्वित थे। बाद में उन्होंने उभयात्मक एक आत्मा को दो भागों में विभक्त कर दिया। सौर यजुराग्नि जिस प्रथम दापत्य से आविर्भूत हुआ है, उसमें ब्रह्माग्नि-सुब्रह्म रूप पुं-स्त्री-भाव बीज रूप में पहिले से प्रतिष्ठित थे। जिसके पार्थिव-चान्द्र भाग की अभिव्यक्ति होने के बाद व्यक्तिभाव मात्र हो जाता है। पुरुष का दक्षिण भाग आग्नेय, वाम भाग सौय है। यही स्थिति स्त्री की है। दोनों ही स्त्री-पुंभाव से समन्वित हैं। दोनों प्रजा की उत्पत्ति में तब तक असमर्थ हैं जब तक वृगल रूप अर्द्ध-अर्द्ध भागों में विभक्त न हो जाएं। सोमगर्भित आग्नेय पुरुष तथा अग्नि गर्भित सौयास्त्री दोनों इस तरह विभक्त होकर दापत्य रूप में ही प्रजनन कर्म में प्रवर्त्तक बना करते हैं।
सौराग्नि ही प्रवर्ग्य रूप भूपिण्ड बना। इसी का भृगु-अंगिरा-अत्रि प्राण चन्द्रसोम में परिणत हुआ। द्यावा पृथिवी रूप सांवत्सरिक-दापत्य भाव के सपादक सावत्सरिक ऋताग्नि वृषा तथा ऋत सोम रूप योषा, दोनों पति-पत्नी भाव एक ही सौर पुरुष के व्याकृत रूप बने। यही सौर पुरुष ‘काम’ का प्रथम पौरुष कहलाया। इसमें अर्द्ध अग्न्याकाश-अर्द्ध सोमाकाश संवत्सर रूप दो अर्द्ध वृगल रूप हो गए। इसी से पार्थिव सर्ग (सृष्टि) आगे बढ़ा। अर्द्ध सौर आकाश अग्नि प्रधान-पुरुष-अर्द्ध वृगल है। अर्द्ध चान्द्र पार्थिव सोम प्रधान स्त्री, अर्द्ध वृगला है। दोनों वृगल एक-दूसरे को पूर्ण करते हैं। दोनों मिलकर एक दपती हैं। संवत्सर प्रजापति हैं।
संवत्सर प्रजापति मण्डल के तीन प्रधान अंग हैं—सूर्य, चन्द्रमा, भूपिण्ड। शरीर में इनका स्वरूप शिर-हृदय-बस्ति तंत्र के रूप में रहता है। इसी प्रकार विष्वद् वृत्त का प्रतिनिधि मेरुदण्ड (रीढ़) है। शरीर में भी दक्षिण-वाम अंग अग्नि-सोम प्रधान हैं। संवत्सर में उत्तर-दक्षिण क्रमश: सोम-अग्नि प्रधान हैं तथा दोनों में 240-240 अंश हैं। मानव शरीर में भी पति-पत्नी के 24-24 पसलियां हैं। इस प्रकार सपूर्ण आकाश रूप में अर्द्ध वृगल-अर्द्धाकाश रूप आग्नेय पुरुष अर्द्ध वृगला-अर्द्धाकाश रूप सौया स्त्री, दोनों मिलकर पूर्ण संवत्सर रूप में कार्य करते हैं। इसमें अग्निप्रधान दक्षिण भाग पुरुष तथा सोमप्रधान उत्तर भाग स्त्री है। इन्हीं दोनों के मेल से स्थूल सृष्टि का वितान होता है। पुरुष के शुक्रसोम के स्त्री के शोणित अग्नि में यजन से प्रजोत्पत्ति का सप्त पुरुष पर्यन्त (सात पीढ़ियों तक) वितान होता है। यही संवत्सर-प्रतिमानत्व है। ऋषि ने पुरुष को संवत्सर की ही प्रतिमा कहा है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com