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ईरान US की नहीं मान रहा, क्या अमेरिका उस पर हमला करेगा, आख़िर दोनों देशों के बीच क्या है विवाद ?

Iran-US Relations: ईरान को अमेरिका के आदेश और उसकी दबंगई पसंद नहीं है और वह उससे डरता भी नहीं है। ईरान का यह रवैया अमेरिका के प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप को पसंद नहीं आ रहा है। ऐसे में गुस्साए ट्रंप ईरान पर हमला कर सकते हैं।

भारतApr 05, 2025 / 01:56 pm

M I Zahir

Iran and US relations

Iran and US relations

Iran-US Conflict: अमेरिका (America) के प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप ( Donald Trump) पूरी दुनिया के देशों को अपने हिसाब से चलने के लिए कह रहे हैं। वे रूस, यूक्रेन,कनाडा, भारत,इज़राइल, ईरान, इराक़ और सीरिया सहित कई देशों को अपने हिसाब से चलने के लिए कह रहे हैं। ट्रंप ने ईरान (Iran) की तेल निर्यात को शून्य करने और उसे परमाणु विकल्प छोड़ने पर मजबूर करने के उद्देश्य से अपनी ‘अधिकतम दबाव’ नीति फिर से लागू की है। अमेरिका (United States) ने इज़राइल (Israel) के मामले में ईरान के रुख पर उस पर शर्त लगाते हुए हिदायत दी है, जो ईरान को पसंद नहीं आई है। ट्रंप को न सुनने की आदत नहींं है और वे ईरान पर हमला कर उस पर गुस्सा निकाल सकते हैं।

तेहरान की प्रतिरोध की दिशा अब प्रभावी नहीं रह गई

दरअसल ईरान-इराक़ युद्ध के बाद से ईरान आज इस समय बाहरी तौर पर सबसे कमजोर हालत में है। लेबनान और गाज़ा में इज़राइल की आक्रमकता ने ईरान के सहयोगियों हिज़्बुल्लाह और हमास को गहरे जख्म दिए हैं, जबकि यमन के हूती अमेरिका की ओर से किए गए व्यापक हवाई हमलों के दबाव में नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान की यह रणनीति है कि वह इज़राइल को ‘आग के घेरे’ से घेरने की कोशिश कर रहा था, अब बशार अल-असद का सीरिया, इसका केंद्र समाप्त हो चुका है। इस तरह, तेहरान की प्रतिरोध की दिशा अब प्रभावी नहीं रह गई है।

ईरान की रक्षा क्षमताओं की कमजोरी उजागर हो गई थी

ग़ौरतलब है कि पिछले साल 26 अक्टूबर को इज़राइली हवाई हमले ने ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमताओं को नुकसान पहुँचाया था और उसके एस-300 वायु रक्षा प्रणाली को निष्क्रिय कर दिया था। इससे पहले, इज़राइल पर ईरान की ओर से किए गए दो ड्रोन और मिसाइल हमले बड़े पैमाने पर अप्रभावी रहे थे, जिससे ईरान की उन रक्षा क्षमताओं की कमजोरी उजागर हो गई थी, जिनकी बहुत चर्चा की जाती थी।

परमाणु शक्ति को निशाना बनाने के लिए दबाव डाला जा रहा है

यहां एक बात याद आती है कि हाल ही में पॉल सालेम ने मिडल ईस्ट इंस्टिट्यूट के लिए लिखा है, “इज़राइल और ईरान के बीच कई वर्षों तक आपसी रक्षा और सीमित दुश्मनी का एक अस्थिर संतुलन बना हुआ था,” लेकिन अब यह संतुलन समाप्त हो चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर इज़राइल की ओर से ईरान के ‘सबसे कमजोर’ समय में उसकी परमाणु शक्ति को निशाना बनाने के लिए दबाव डाला जा रहा है, वरना वे खुद यह कदम उठाने की धमकी दे रहे हैं।

‘बंदूक की नोक पर कूटनीति’ का तरीका अपनाने को ही प्राथमिकता

देखने में हालात ऐसे हैं कि एक ओर डोनाल्ड ट्रंप सैन्य कार्रवाई नहीं करना चाहते, इसके बजाय कहने को वे ‘बंदूक की नोक पर कूटनीति’ का तरीका अपनाने को ही प्राथमिकता देते हैं। इस बीच ट्रंप ने ब्रेट बेयर को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा, “इसे (ईरान) रोकने के दो तरीके हैं: बमों से या कागजी कार्रवाई से और मुझे एक समझौता करना ज्यादा पसंद है।” इसके बाद उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर को सीधे परमाणु वार्ता की पेशकश करते हुए पत्र लिखा है।

ईरान ने 20 % और 60 % संवर्धित यूरेनियम के भंडार में वृद्धि कर दी

ईरान ने 20 प्रतिशत और 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम के भंडार में वृद्धि कर दी है। अगर ईरान बम बनाने का निर्णय लेता है, तो इस वृद्धि के बाद वह इसके बहुत करीब पहुंच सकता है, या फिर वह इस वृद्धि को 2015 के संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) को बहाल करने के लिए दबाव बनाने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

ईरानी राष्ट्रपति ने सत्ता में आने के बाद JCPOA में वापसी में दिलचस्पी दिखाई

ध्यान रहे कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेकयान ने सत्ता में आने के बाद JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) में वापसी में दिलचस्पी दिखाई है। ईरान के सुप्रीम लीडर के सलाहकार अली लारीजानी का दृष्टिकोण इस संदर्भ में अधिक स्पष्ट है। उन्होंने ट्रंप प्रशासन से बात करते हुए एक मीडिया इंटरव्यू में कहा, “हम बम नहीं बनाएंगे, आप एक समझौते पर पहुंचने के लिए हमारी शर्तें स्वीकार करें।”

ईरानी सरकार को गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा

ट्रंप के अत्यधिक दबाव के कारण ईरानी सरकार को गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। चीन के समर्थन को लेकर संदेह है, इस वजह से राहत प्राप्त करना संदेहास्पद नजर आता है, क्योंकि यह वाशिंगटन के साथ संभावित रणनीतिक समझौते का हिस्सा हो सकता है, और पुतिन की ट्रंप के साथ उभरती हुई दोस्ती के दृष्टिकोण में रूस के समर्थन को लेकर भी स्थिति अनिश्चित है।

इज़राइल ईरान को विस्तारवादी दृष्टिकोण से देखता है

इज़राइल को यहां ईरान की परमाणु सुविधाएं खत्म करने का एक अवसर तो दिखाई दे रहा है, लेकिन उसके पास ऐसा करने की क्षमता नहीं है। उसे अमेरिका में भी कोई पार्टनर नहीं मिलेगा, जो शायद इस क्षमता तो रखता हो, लेकिन ऐसा इरादा नहीं रखता। इज़राइल ईरान को विस्तारवादी दृष्टिकोण से देखता है, जबकि अमेरिका का हित कहीं अधिक व्यापक है।

परिणामस्वरूप एक भयानक युद्ध हो सकता है

वाशिंगटन ईरान और उसके परमाणु कार्यक्रम को वैश्विक भू-राजनीति, मध्य पूर्व में अपने क्षेत्रीय हितों, और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और वैश्विक नौवहन से उसके संबंधों के संदर्भ में देखता है, जो अमेरिका या इज़राइल की किसी भी सैन्य कार्रवाई के ईरानी प्रतिक्रिया के खतरे से प्रभावित हो सकता है, जिसके परिणामस्वरूप एक भयानक युद्ध हो सकता है। आत्मनिर्भर ट्रंप युद्ध पसंद नहीं करते।

अमेरिकी हथियारों पर निर्भरता में भी कमी हो सकती है

इस प्रकार, ट्रंप का ईरान पर हमला करने या इज़राइल को हमले के लिए हरी झंडी देने का कोई संभावना नहीं है। ईरान के ‘खतरे’ के समाप्त होने से अरब राजशाही खुद को अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करने लगेंगी, और इस प्रकार अमेरिका के प्रभाव और इज़राइल के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए उन पर दबाव कम हो सकता है, और संभावित रूप से अमेरिकी हथियारों पर निर्भरता में भी कमी हो सकती है।

ईरान पर हमला उसे चीन की ओर भी धकेल सकता है

ऐसा लग रहा है कि ईरान पर हमला उसे चीन की ओर भी धकेल सकता है। इस प्रकार यह हमला पूर्व ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक के दौर का इतिहास फिर से दोहराएगा, जिनकी सरकार का 1953 में तख्ता पलट दिया गया था। इस प्रकार ईरान और अमेरिका के रिश्ते एक बार फिर दशकों पीछे चले जाएंगे।

एक परमाणु समझौता मददगार साबित हो सकता है

हालांकि, अप्रत्याशित युद्ध होने के बावजूद तेहरान के लिए स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है। प्रतिबंधों के साथ-साथ बढ़ती हुई जनता की शिकायतें एक गंभीर खतरे के रूप में सामने आई हैं। इन परिस्थितियों में एक परमाणु समझौता मददगार साबित हो सकता है। हालांकि, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर समझौता नहीं करेगा, क्योंकि यह सरकार के अस्तित्व की अंतिम गारंटी है, लेकिन यह परमाणु कार्यक्रम वापस पलटने का खतरा उठा सकता है।

कमजोर ईरानी सरकार सभी खतरों को संभाल नहीं सकती

इन हालात में ईरान का परमाणु कार्यक्रम वैसे भी एक ऐसे स्थान पर पहुँच चुका होगा, जहाँ से हथियार बनाने की दिशा में कोई भी और कदम सैन्य हमले का खतरा बढ़ा सकता है। कमजोर ईरानी सरकार क्षेत्र में अपनी कमजोर स्थिति सहित इन सभी खतरों को संभाल नहीं सकती और वह बहुत ही सतर्क कदम उठा रही है।

ईरान ने शायद मौके का फायदा उठाने का चुनाव किया है

डोनाल्ड ट्रंप ईरान को ‘खतरा मोल लेने’ या ‘मौके का फायदा उठाने’ की पेशकश कर रहे हैं। ईरान ने शायद मौके का फायदा उठाने का चुनाव किया है। ईरान को बस इतनी छूट देनी पड़ सकती है कि ट्रंप अपने समर्थकों के सामने यह बात साबित कर सकें कि उन्होंने उस समझौते से बेहतर सौदा किया जिसे उन्होंने पहले छोड़ दिया था, जैसा कि उनके पहले कार्यकाल में उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते (NAFTA) के पुनः वार्ता के मामले में हुआ था।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) जलन की वजह

ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका के लिए एक बड़ा विवादित मुद्दा रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देश यह मानते हैं कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है, जबकि ईरान इसका खंडन करता है और कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ईरान ने सन 2015 में अमेरिका और अन्य देशों के साथ JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) या परमाणु समझौता किया है, जिसमें ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियां सीमित करने के बदले में प्रतिबंधों में राहत दी है। हालांकि, 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से बाहर निकलने का निर्णय लिया, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया है।

अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध (Economic Sanctions) लगाए हैं

अमेरिका ने ईरान पर कई प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, विशेष रूप से ईरान के तेल निर्यात, बैंकिंग सिस्टम और अन्य आर्थिक गतिविधियों को निशाना बनाया है। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों पर दबाव बनाना है। इन प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और इसे वैश्विक बाजार से अलग कर दिया है।

ईरान और अमेरिका में क्षेत्रीय प्रभाव और नीति (Regional Influence and Policy)

ईरान और अमेरिका के बीच विवाद का एक और बड़ा कारण क्षेत्रीय राजनीति है। ईरान मध्य पूर्व में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाता है, विशेष रूप से सीरिया, इराक, लेबनान (हिज़्बुल्लाह), और यमन (हूती मिलिशिया) में। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को यह चिंता है कि ईरान अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है और क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर रहा है। अमेरिका, इज़राइल और अरब सहयोगी देशों ने ईरान के इस प्रभाव को चुनौती दी है।

ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य गतिविधियाँ (Military Activities)

ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य गतिविधियां भी तनाव का कारण बनी हैं। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अपना सैन्य प्रभाव बढ़ाया है, और अमेरिकी सेना इसके खिलाफ प्रतिक्रिया देती रही है। ध्यान रहे कि सन 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के प्रमुख सैन्य जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या से हालात तनावपूर्ण बने हैं। इसके बाद, ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए ​हैं, जिससे दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव का खतरा बढ़ गया है।

अमेरिका इज़राइल का समर्थक (Israel Issue) और ईरान को आंख दिखा रहा

ईरान इज़राइल का खुले तौर पर विरोध करता है और उसे एक “कैंसर का ट्यूमर” कहता है। अमेरिका इज़राइल का प्रमुख सहयोगी है, और यह संबंध भी ईरान और अमेरिका के बीच के झगड़े का एक कारण है। इज़राइल के लिए ईरान की आक्रामक नीति को अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है।

अमेरिका ईरान के मानवाधिकार (Human Rights) का आलोचक

अमेरिका ने ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति पर विशेषकर सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दमन, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, और प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों की कई बार आलोचना की है। अमेरिका ईरान पर दबाव डालता है कि वह अपने आंतरिक मामलों में खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संदर्भ में सुधार करे।

दोनों देशों के बीच रिश्तों में तनाव लगातार बना रहता है

बहरहाल ईरान और अमेरिका के बीच झगड़े का मूल कारण उनकी नीतियों, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं से जुड़ा हुआ है। हालांकि दोनों देशों के बीच बातचीत होती रहती है, लेकिन उनके रिश्तों में तनाव लगातार बना रहता है। ऐसे में अमेरिका के प्रेसीडेंट डोनाल्ड ट्रंप को कब गुस्सा आ जाए और कब उनका मूड बदल जाए, कहा नहीं जा सकता। इसी गुस्से में वे ईरान पर हमला भी कर सकते हैं।

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