मुख्य धारा में लाने की कोशिश
गृह मंत्रालय ने नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए मार्च 2026 तक का लक्ष्य तय किया है। इसके तहत सुरक्षाबलों की तैनाती बढ़ाई गई है और विकास कार्यों को गति दी जा रही है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी साफ कहा है कि मध्यप्रदेश में नक्सलवाद के लिए कोई स्थान नहीं है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं। समर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, पुनर्वास और रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं, ताकि वे मुख्यधारा में लौट सकें।कोबरा बटालियन की तैनाती
वर्ष 2015 तक, जब सड़कों का जाल दुर्गम इलाकों तक फैलने लगा, तो कोबरा बटालियन की एक टुकड़ी बालाघाट पहुंची। इस बटालियन ने करीब तीन वर्षों तक सघन सर्च अभियान चलाया। कोबरा बटालियन के डर, सड़कों के निर्माण और पुलिस की तेजी से कार्रवाई के कारण नक्सली गांवों से सिमटकर जंगलों में चले गए। नक्सलियों ने नए ठिकाने की तलाश शुरू की, जिसका नतीजा यह हुआ कि उन्होंने डिंडोरी और मंडला जिले को नया गढ़ बना लिया।बालाघाट को बनाया सुरक्षित ठिकाना
बालाघाट जिले के घने जंगल और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां नक्सलियों के लिए हमेशा से सुरक्षित ठिकाना बनी रही हैं। वर्ष 2010 तक नक्सलवाद अपने चरम पर था। नक्सली समूह प्रशासन और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने हुए थे और उनकी गतिविधियों से क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल था। हालांकि अब इस पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा चुका है, लेकिन नक्सल गतिविधियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। अब भी नक्सली मूवमेंट सामने आते रहते हैं। पुलिस ने सुरक्षा नेटवर्क को मजबूत किया है, जिससे वे पहले की तरह खुलेआम नजर नहीं आते। बालाघाट नक्सलियों के लिए हमेशा एक सुरक्षित ठिकाना रहा है। वे छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में किसी वारदात को अंजाम देने के बाद यहां आकर छिपते थे।कावरे की हत्या से दहल उठा था प्रदेश
15 दिसंबर 1999 को बालाघाट के तत्कालीन परिवहन मंत्री लिखीराम कावरे की नक्सलियों ने निर्मम हत्या कर दी थी। वे ग्राम सोनपुरी (किरनापुर) में अपने घर पर थे, जब बड़ी संख्या में नक्सलियों ने उन्हें घेरकर कुल्हाड़ी से मौत के घाट उतार दिया। बताया जाता है कि उनकी हत्या 2 दिसंबर 1999 को माओवादी सेंट्रल कमेटी के तीन सदस्यों—श्याम, महेश और मुरली की पुलिस मुठभेड़ में हुई मौत के बदले में की गई थी।नक्सलवाद पर लगाम के लिए उठाए गए कदम
0-सुरक्षा बलों की बढ़ती पैठ: कोबरा बटालियन, एसटीएफ और जिला पुलिस का संयुक्त अभियान जारी। 0-दुर्गम इलाकों तक सड़कें बनाई गईं, जिससे सुरक्षा बलों की पहुंच आसान हुई।मुखबिरी के शक में हत्याएं
15 अप्रेल 2016: ग्राम जालदा निवासी रतिराम की हत्या।12 नवंबर 2016: ग्राम अडोरी निवासी कार्तिक धुर्वे की हत्या।
20 फरवरी 2017: ग्राम डाबरी निवासी धन्नू टेकाम की हत्या।
20 जून 2019: ग्राम डाबरी निवासी ब्रजलाल पंद्रे की हत्या।
17 नवंबर 2019: ग्राम चिलकोना निवासी नेगलाल पंद्रे की हत्या।
29 जून 2021: ग्राम बम्हनी निवासी भागचंद आर्मो की हत्या।
12 नवंबर 2021: ग्राम मालखेड़ी निवासी जगदीश पटले की हत्या।
22 मार्च 2022: मालखेड़ी निवासी यदूनाथ, संतोष यादव और वन श्रमिक सुखदेव पटले की हत्या।
नक्सलियों की प्रमुख मांगें
0-मजदूरों का शोषण रोका जाए।0-जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का अधिकार हो।
0-स्थानीय प्रशासन में बढ़ाई जाए आदिवासियों की भागीदारी।
0-पूंजीपतियों को जंगल की जमीन न दी जाए।
0-सामाजिक और आर्थिक असमानता दूर की जाए।
0-भूमि सुधार लागू किए जाएं।
मुठभेड़ों में मारे गए नक्सली
19 फरवरी 2025: गढ़ी थाना क्षेत्र के सूपखार जंगल में पुलिस मुठभेड़ में चार महिला नक्सली मारी गईं।1 अप्रैल 2024: केरेझरी जंगल में नक्सली साजंती और शेर सिंह पुलिस मुठभेड़ में मारे गए।
8 जुलाई 2024: कोठिया टोला के जंगल में एक इनामी नक्सली मारा गया।
28-29 सितंबर 2023: कुंदुल के जंगल में कुख्यात नक्सली कमलू पुलिस मुठभेड़ में मारा गया।
22 अप्रैल 2023: पुलिस मुठभेड़ में डॉक्टर कही जाने वाली नक्सली सुनीता और सरिता मारी गईं।
20 जून 2022: लोढांगी चौकी के कादला में नक्सली नागेश उर्फ राजू तुवाली, मनोज और महिला रामे मारे गए।
30 नवंबर 2022: सूपखार के जामसेहरा में नक्सली राजे उर्फ नंदना वंजाम और गणेश मेरावी मारे गए।
18 दिसंबर 2022: हर्राटोला में नक्सली रूपेश मारा गया।
2020: किरनापुर के बोरबन जंगल में नक्सली शोभा और सावित्री मारे गए। एक नक्सली को गिरफ्तार किया गया।
2019: देवरबेली के पुजारीटोला में नक्सली अशोक उर्फ मंगेश और महिला नंदे मारे गए। इसके अलावा भी कई नक्सली मुठभेड़ में मारे गए हैं।)