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पंचमी के परिंदे हैं, दाना चुगने फिर घर द्वार छोड़ शहर जाएंगे

– कब खत्म होगा बुंदेलखंड की पांच पीढ़ियों का पलायन, सागर, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़ में सबसे ज्यादा स्थिति खराब

– 10 से 12 लाख लोग रोजी रोटी की तलाश में जाते हैं दिल्ली, गुड़गांव, नोयडा, नागपुर, मुंबई, सूरत, हरियाणा और जम्मू तक

सागरMar 20, 2025 / 08:34 pm

प्रवेंद्र तोमर

मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड की जिस माटी में जन्मे आज वहीं के परिंदे बनकर रह गए हैं बुंदेलखंड के 10 से 12 लाख लोग। होली, दीपावली त्योहारों पर ये अपने घर लौटकर आशियाने को रोशन करते हैं। त्योहार खत्म होते ही घर में अंधेरा कर, ताले डाल दाने की तलाश में उड़ जाते हैं। ऐसे ही लाखों लोग त्योहार पर इस बार भी घर लौटे। चिड़िया के घोंसले की तरह घर आबाद किया, पांच दिवसीय त्योहार पर अलग-अलग रंगों से घर में जान डाली। मिलजुलकर फाग गाए, त्योहार खत्म होते ही ये परिंदे फिर से दाने की तलाश में घर द्वार छोड़ जाएंगे।
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अभी बरस रहा रंग: रंगपंचमी पर गा रहे बुंदेली फाग

छतरपुर के झमटुली गांव के काफी लोग पलायन करते हैं, होली के त्योहार पर घर लौटे ये लोग होली जलते ही फाग की महफिल सजाने लगते हैं जो रंगपंचमी तक सजती है। गांव की पुरानी परंपराओं में ढलकर होली मनाते हैं गले मिलते हैं। गांव के गणेश पाल, संतोष पाल, प्रकाश मजदूरी करने के लिए जम्मू जाते हैं, होली पर घर आए हैं। त्योहार खत्म होते ही पलायन शुरू कर देंगे। दमोह के वर्धा गांव में 40 साल से भी ज्यादा समय से लोग पलायन कर रहे हैं, त्योहार के समय ये गांव आबाद है, लोग फाग गा रहे हैं। गुरुवार से त्योहार खत्म हाेते ही ये गांव सूने होने लगेंगे। मई जून में इन गांवों की ऐसी स्थिति हो जाती है मानों कोई बीमारी फैल गई हो। आधार सेंटर भी इन लोगों के लौटने पर खुलते हैं।

देखें वीडियो-

रंगों को साफ कर डाल जाते हैं ताले

त्योहार खत्म होते ही घर को फिर से झाड़ पोंछते हैं, फैले हुए रंगों को समेटकर ताला डालकर वापस चले जाते हैं। दमोह के वर्धा गांव में अभी से पलायन शुरू हो गया है, वजह, त्योहार के बाद अचानक भीड़ बढ़ने से ट्रेनों में जगह न मिलना। नमई आदिवासी बताते हैं कि होली के बाद अब वापस मजदूरी के लिए घर को छोड़कर दिल्ली जाएंगे, रात से ही सामान बांधना शुरू हो जाएगा।
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पांच पीढ़ियों से चला आ रहा पलायन


कई गांव ऐसे हैं जिनमें पांच पीढि़यों से पलायन होता आ रहा है। इसमें ज्यादातर दमोह, छतरपुर और टीकमगढ़ के गांव हैं। यहां के दूर राज क्षेत्रों में पानी की काफी कमी है, मई जून के महीने में लोगों के पास पीने के लिए पानी तक नहीं होता है। कई कई किमी से पानी लाना पड़ता है। ये पलायन रबी की फसल और त्योहार के बाद ज्यादा होता है, गांव के गांव खाली हो जाते हैं, घरों में ताले डल जाते हैं।
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यहां सबसे ज्यादा पलायन



दमोह: जबेरा, तेंदूखेड़ा, हटा, पटेरा, वर्धा, बटियागढ़, रोढ़ा, खेजरा, बोरी, सिकरदा, सगरोन व अन्य गांव।
टीकमगढ़: जतारा, खरगापुर, बल्देवगढ़।
छतरपुर: चंदला, लवकुश नगर, राजनगर, नौगांव, महाराजपुर, बिजावर तहसील के गांव।
सागर: बंडा, सुरखी, देवरी से ज्यादा पलायन।

इन पर पड़ता है असर

  • बच्चे सही तरीके से पढ़ नहीं पाते, शिक्षा का स्तर गिर रहा है।
  • महिलाएं गर्भवती होने के बाद गांव लौटकर प्रसव कराती हैं, कई बार लास्ट समय पर आने से खतरा बढ़ जाता है।
  • पीढ़ी दर पीढ़ियां मजदूरी कर कमाओ और खाओ में ही गुजर जाती हैं, विकास का दूर दूर तक नाता नहीं।

दो तरह के प्रयासों से ही रुक सकता है पलायन-


बुंदेलखंड प्रदेश का एक ऐसा क्षेत्र है, जहां से सबसे ज्यादा पलायन होता है। इसको रोकने के लिए दो प्रयास असरदार साबित हो सकते हैं। पहला लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार के साधन उपलब्ध कराए जाएं और दूसरा स्वास्थ्य व शिक्षा की व्यवस्था भी स्तरीय हो। कोविड के दौर में जब लोग बाहर थे, तो उनके सामने यह समस्या आई थी कि उनके साथ वहां पर कोई भी नहीं था। इस वजह से लोग अपने जिले व गांव में रहना तो चाहते हैं, लेकिन जब उन्हें रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य की सही सुविधा स्थानीय स्तर पर नहीं मिल पाती तो वे पलायन कर जाते हैं।

‌- प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत, एचओडी, समाजशास्त्र विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विवि.

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