गौरतलब है कि प्रदेश के विभिन्न न्यायालयों में राजस्व से जुड़े 6.57 लाख से अधिक प्रकरण लम्बे समय से लम्बितपड़े हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इसको लेकर गत 28 जनवरी को राजस्थान पत्रिका ने ‘नियमों का सरलीकरण से ही कम हो सकता है राजस्व मुकदमों का अंबार’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर लम्बित प्रकरणों की गंभीरता को बताया था।
नागौर उपखंड में छह माह में निस्तारण किए गए प्रकरण धारा 128 पत्थरगढीसम्बन्धी – 26 धारा 251क रास्ते सम्बंधित – 32 धारा 136 तरमीम शुद्धि – 39 धारा 75 नामान्तरण अपील – 44
बंटवाड़ा, खातेदारी उद्घोषणा, स्थाई निषेधाज्ञा – 159 धारा 212 स्थगन – 174 धारा 151 विविध – 7 राजस्व विवादों से बचने के लिए एसडीएम भींचर के सुझाव – राजस्व प्रकरणों में लगातार हो रही वृदि्ध को लेकर नागौर एसडीएम भींचर ने पत्रिका को बताया कि परिवार में जब सभी सदस्य आपस में राजी व हंसी खुशी से रहे व आपस में लड़ाई-झगड़ा न हो, तभी संयुक्त/पुश्तैनी भूमियों का बंटवाड़ा करवा लिया जाना चाहिए। संयुक्त खातेदारी होने से कई प्रकार के राजकीय व अन्य लाभ भी नहीं मिलते हैं।
– परिवार के सभी सदस्य जब मिलकर आपस में बंटवाड़ा करवाते हैं, तभी सदस्यों को अपनी भूमि तक जाने को रास्ते के लिए अलग से भूमि रखने के साथ उसे राजस्व रिकाॅर्ड में आवश्यक रूप से इन्द्राज करवाना चाहिए।
– परिवार की पीढ़ी आगे बढ़ने व किसी सदस्य की ओर से अपनी भूमि का बेचान कर देने के बाद उक्त भूमि का क्रेता या दूसरी पीढ़ी के परिवार के सदस्य अपने ही परिवार के सदस्य को रास्ते के उपयोग करने से मना कर देते हैं, जिससे अनावश्यक विवाद बढ़ता है तथा परिवार के सदस्य या पड़ोसियों से रिश्ते खराब होते हैं तथा न्यायालयों में चक्कर काटने से आर्थिक नुकसान होता है तथा समय बीतता जाता है व पीढी़यां तक परेशानी होती है।
– सभी किसान वर्ग/व्यक्ति इस बात का आकलन व मनन करे कि आपको भूमि संबंधी कोई भी विवाद होने पर उसे न्यायालय में दायर करने में कितना फायदा होता है? किसी भी व्यक्ति की ओर से जब न्यायालय में अपना वाद/प्रार्थना पत्र लगाया जाता है तो वह बरसों तक चलता है, जिससे सगे भाई-बहन, पिता-पुत्र, माता-पुत्र, दादा-दादी, मामा-मामी, नानी-नाना व अन्य रिश्तेदार व पड़ोसी मिलनसार व्यक्ति से बोलचाल बंद हो जाती है तथा आपस में विवाद होने से लड़ाई-झगड़े बढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों को भारी आर्थिक नुकसान भी होता है। आखिर में जब न्यायालय की ओर से किसी एक पक्षकार के पक्ष में फैसला हो जाता है तो दूसरा पक्ष उस निर्णय के विरुद्ध अग्रिम न्यायालय में जाकर अपील करता है, इस प्रकार यह मामला अनवरत चलता ही रहता है। इस प्रकार से प्रकरण अनवरत होने से पीढ़ियों की पीढ़ियां बदल जाती हैं।
– राजस्व न्यायालयों में कई प्रकरणों में भाइयों के आपसी विवाद में बहन एक भाई का पक्ष लेकर हिन्दू उत्तराधिकर के तहत प्रकरण दायर करती है। बहन के प्रकरण दायर करने से भाई-बहन के रिश्ते में लंबा विवाद हो जाता है, जो भाई-बहन बचपन में एक साथ आपस में मिलकर बड़े होते हैं, वो इस प्रकार के विवाद से एक-दूसरे से बोलचाल बंद कर देते हैं। बहन के बेटे अपने जीवन में ननिहाल नहीं जा सकते हैं तथा न ही नाना-नानी, मामा-मामी के रिश्ते के संबंध में उनकी धारणाएं गलत बन जाती है तथा व न ही अपने जीवन में ननिहाल जा पाते हैं।
– रास्ते संबंधी प्रकरणों में येन-केन प्रकरणों विपक्षी पक्षकार रास्ते नहीं देने के लिए अपने प्रयास करता है। किसी पक्षकार को रास्ते की आत्यधिक आवश्यकता हो, उसको अपनी जोत तक पहुंचने का कोई वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध न हो, फिर भी विरोध पक्षकार उसे रास्ता नहीं देने के लिए येन-केन प्रयास करते हैं। अपितु विरोधी पक्षकार को इस बात का मनन करना चाहिए कि वह भी अपनी जोत तक पहुंचने के लिए किसी की भूमि से ही जाकर ही पहुंचता है। इस प्रकार रास्ते नहीं देने के प्रयास से आपसी परिवार के रिश्तेदारों/सदस्यों व पड़ोसियों के संबंध कटु होते हैं।